August 4, 2021

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LJP split: सियासत में हर चाचा-भतीजे का यही हाल है!

राजनीति में फायदे का स्वार्थ सबसे पहले रिश्तों की बलि लेता है. ताजा मामला लोक जनशक्ति पार्टी (LJP split news) के पासवान कुल में चाचा भतीजे के बीच पड़ी फूट का है. वैसे चाचा-भतीजे के बीच तनातनी का ये पहला मामला नहीं है. धृतराष्ट्र और पांडु पुत्रों के बीच हुए सत्ता संघर्ष से इसका सिरा जोड़ सकते हैं.

राजनीति की दुनिया में रिश्तों के क्या मायने हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है. जहां कुर्सी की बात आती है सालों का विश्वास एक कोना पकड़कर चुपचाप अपनों को एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते और रिश्तों को बिखरते हुए देखता है. हमारे यहां राजनीति में परिवारवाद हावी रहता है लेकिन ये सियासी रिश्ते ज्यादातर अवसर के हिसाब से निभाए जाते हैं.

मौकापरस्त रिश्तों की पोल तब खुलती है जब राजनीती की चाल जनता के सामने आ जाती है. ऐसे तो राजनीति में भाई-भाई का सगा नहीं होता, बेटा-पिता के खिलाफ हो जाता है तो मां-बेटी एक दूसरे के सामने राजनीति की जंग लड़ रही होती हैं लेकिन आज हम सिर्फ चाचा-और भतीजे की बात करते हैं, क्योंकि राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा में यही जोड़ी रहती है.

इस वक्त लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) में चाचा पशुपति पारस और भतीचे चिराग पासवान (Chirag Paswan vs Pashupati Paras) की चर्चा आम बनी हुई है. जिनके बीच रामविलास पासवान की मौत के सिर्फ 8 महीने बाद ही जंग छिड़ गई है. लोग नजर बनाए हुए हैं कि ना जाने अगले पल क्या हो जाए. इन दोनों की लड़ाई में गेहूं के साथ घुन की तरह पीस रहे हैं बेचारे कार्यकर्ता और समर्थक जो पटना से लेकर दिल्ली तक सड़क पर उतर गए हैं.

 

असल में यह मामला तब खुला जब चाचा पशुपति पारस ने भतीचे चिराग पासवान को अध्यक्ष पद से हटा दिया. इसके बदले में भतीजे ने चाचा समेत सभी 5 बागी सांसदों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब देखना है कि पार्टी की कमान किसके हाथ में जाती है.

हां इस बात को मत भूलिए कि भारत की राजनीति में सिर्फ चाचा पशुपति पारस और भतीजे चिराग के बीच ही ऐसी ताना-तानी नहीं हई है बल्कि लगभह हर चाचा-भतीजे की सियासी जोड़ियों की लगभग यही कहानी है. अगर कोई राजनीति परिवार इससे बचा हुआ है तो यह अपवाद होगा, क्योंकि क्या राष्ट्रीय दल और क्या क्षेत्रीय दल सबका यही हाल है. आइए एक नजर इन प्रमुख जोड़ियों पर भी डालते हैं.

1- राजनीति में अब चाचा-भतीजे की बात हो और शिवपाल और अखिलेश यादव की बात ना हो यह कैसे संभव हो सकता है. यह बात सबको पता है कि समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल यादव की कितनी अहम भूमिका रही है. इस बात को कोई पक्ष और विपक्ष दोनों नहीं नकार सकते. बताने वाले बताते हैं कि पार्टी के प्रचार के लिए शिवपाल साइकिल से गांव-गांव घूमे थे लेकिन जब बात राजनीतिक विरासत को सौंपने की घड़ी आई तो भाई और बेटे में मुलायम सिंह यादव का पुत्र प्रेम जीत गया. उन्होंने भाई की जगह अपने बेटे को चुना और अखिलेश यादव को राजनीतिक उत्तराधिकारी बना दिया. जिसके बाद शिवपाल यादव ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी भी बना ली.

2- जब बाला साहेब ठाकरे राजनीतिक में सक्रिय थे तब राज ठाकरे को उनके काफी करीबी माना जाता था. राज को यह पूरा विश्वास था कि बाला साहेब के बाद उन्हें राजनीतिक विरासत का वारिस बनाया जाएगा. मगर सियासत में जो होता है वह किसी को दिखता नहीं है. इस रिश्ते में खटास तब आई जब बाला साहेब ने राज ठाकरे की जगह उद्धव को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया. इसके बाद राज ठाकरे ने अपनी राहें अलग कर ली और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपना नया दल बना लिया. हालांकि, राजनीतिक रूप से राज ठाकरे को वो सफलता नहीं मिली जिसके वो हकदार थे.

3- राष्ट्रवादी कांग्रेस प्रमुख शरद पवार और अजीत पवार की जोड़ी राजनीति की दुनिया में काफी मशहूर है. अजीत पवार अपने चाचा शरद पवार को राजनीतिक गुरु मानते हैं लेकिन चाचा को झटका तब लगा जब भजीते ने भनक लगे बिना भाजपा के साथ मिलकर रातों-रात सरकार बना ली थी. इसके बाद अजीत पवार उपमुख्यमंत्री बन गए थे. हालांकि, यह तीन दिन से ज्यादा टिक नहीं पाया. इसके बाद अजीत पवार ने अपना इस्तीफा दे दिया और दोबारा अपने चाचा की पार्टी में ही लौट आए.

4- पंजाब में बादल परिवार को कौन नहीं जानता. चाचा प्रकाश सिंह बादल और भतीजे मनप्रीत बादल का विवाद शायद ही किसी से छिपा हो. मनप्रीत, प्रकाश सिंह बादल के छोटे भाई गुरदास सिंह बादल के बेटे हैं. इनकी कहानी भी किसी से अलग नहीं है. असल में जब प्रकाश सिंह बादल ने जब अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल का राजनीतिक कद आगे बढ़ाया तो भतीजे मनप्रीत को यह बात नागवारा गुजरी. जिसके बाद नाराजगी जाहिर करते हुए मनप्रीत बादल ने बगावत कर दिया और पंजाब पीपुल्स पार्टी का गठन कर लिया. ये बात अलग है कि बाद में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया. आज के समय में मनप्रीत, पंजाब की राजनीति में एक कुशल नेता और वित्त मंत्री के रूप में जाने जाते हैं.

दरअसल, ये बात यहीं खत्म नहीं होती, राजनीति में कब क्या हो जाए ये कोई नहीं जानता. जो आज अलग हैं कल को दोबारा एक हो सकते हैं और जो एक हैं वे कल को बिछड़ भी सकते हैं. यह राजनीति है साहब, इसका सियासी गणित समझना इतना आसान नहीं…यहां लोगों को दूसरों से ज्यादा अपनों से खतरा रहता है.

 

रामविलास पासवान ने बताया है कब क्या करना- पारस ने कहा कि पार्टी की स्थापना 28 नंवबर, 2000 में हुई थी. अब इसके 21 वर्ष बीच चुके हैं. पार्टी में कोई भी मतभेद या मनभेद नहीं है. अगर मतभेद होता तो मैं निर्विरोध अध्यक्ष नहीं चुना जाता. पारस ने आगे कहा कि मेरे बड़े भाई रामविलास पासवान का सपना था कि शोषित, दलित, गरीब, पिछड़ा, अतिपिछड़ा, अकलियत और उंची जाति में भी आर्थिक सामाजिक शैक्षिणिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिए काम हो. वो कहा करते थे कि गरीब-अमीर में जब लड़ाई हो तो गरीब का, पुरुष-स्त्री में स्त्री का और हिंदू -अकलियत में अकिलियत का साथ देना चाहिए.

वहीं पीसी में मीडिया के सवालों को जवाब देते हुए पशुपति कुमार पारस कई बार नाराज गये. चिराग पासवान की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर रहने के दावे पर उन्होंने कहा कि पार्टी में कोई आजीवन राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं रहता. जैसे देश संविधान से चलता है. वैसे ही पार्टी भी संविधान से चलती है. चिराग को पद से हटाने के सवाल पर खींझते हुए पारस ने कहा कि भतीजा तानाशाह हो जाये तो चाचा क्या करेगा? यहां प्रजातंत्र है कोई आजीवन अध्यक्ष नहीं रह सकता. वहीं उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी गृह युद्ध की बात नहीं की है. पार्टी में कोई मतभेद नहीं है

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